रिश्तों में संस्कृति का अभाव
किसी व्यक्ति
का रहन-सहन, उसकी भाषा शैली, लोगों के साथ उसका व्यवहार आदि उस व्यक्ति के आचरण को दर्शाते हैं। और इसी
आचरण के माध्यम से उसके संस्कारों का, उसकी संस्कृति का पता चलता है।
परंतु आज व्यक्ति के आचरण में उसकी संस्कृति तनिक भी दिखाई नहीं देती या फिर कहा
जाए कि व्यक्ति के संस्कारों का दायरा अब सीमित हो चुका है क्योंकि उसका आचरण आज
की परिस्थिति में बिलकुल परिवर्तित हो चुका है।
आज संस्कारों
की बात सिर्फ मुख पर ही आकर रह जाती है वह आचरण में नहीं उतर पा रही। और इसका
उदाहरण व्यक्ति कैसे पहने रिश्तों में देखा जा सकता है। आज व्यक्ति अपने रिश्तों
में मर्यादा का उल्लंघन कर बैठा है क्योंकि उसे रिश्तों का अर्थ सही प्रकार से समझ
नहीं आता, या फिर कहा जाए कि उसे इसका अर्थ किसी ने बताया ही नहीं।
जहाँ दोस्ती का
सम्बंध आता है वहाँ बिना गाली के काम चल ही नहीं सकता और इसे सही दर्शाने के लिए
जो तर्क दिया जाता है वह है, "दोस्ती में तो सब कुछ चलता है!"।
परंतु जहाँ मित्रता की बात आती है तो सबसे अधिक नाम कृष्ण और सुदामा का लिया जाता
है। क्या उनमें ऐसा चलता था? यह सोचने की बात है!
ठीक उसी प्रकार
देवर और भाभी का रिश्ता भी मलिन हो चुका है। आज देवर और भाभी का रिश्ता एक मजाक का
रिश्ता बन चुका है जिसमें किसी भी स्तर का मजाक मान्य है। परंतु यह भारतीय
संस्कृति को नहीं दर्शाता। जहाँ एक तरफ लक्ष्मण जी सीता जी को अपनी माता समान
मानते हैं वहीं दूसरी ओर आज का पीढ़ी भाभी के साथ किसी भी प्रकार का मजाक कर लेती
है, जो भारतीय परंपरा में अनुचित है।
ऐसे ही जीजा और
साली का रिश्ता भी मर्यादाहीन हो चुका है। मजाक ही मजाक में यहाँ तक कह दिया जाता
है कि साली तो आधी घरवाली होती है। परंतु क्या श्री राम जी ने सीता जी की तीनों
बहनों के साथ ऐसा व्यवहार किया था। क्योंकि जहाँ मर्यादा की बात आती है वहाँ
मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम जी को अवश्य याद किया जाता है तो उनके जैसा आचरण
क्यों नहीं किया जाता। श्री राम जी ने तो कभी भी अपनी सालियों के साथ ऐसा आचरण
नहीं किया और किसी प्रकार के मजाक का उल्लेख भी रामायण में नहीं मिलता, तो फिर आज व्यक्ति के आचरण में बदलाव कैसे आया। आज साला और साली शब्द गाली के
रूप में प्रयोग किए जाते हैं। ऐसा क्यों? यह शब्द तो एक रिश्ते को दर्शाता
हैं। तो फिर इस रिश्ते को धूमिल किसने किया? इस पर विचार करने की आवश्यकता है।
ऐसे ही गुरु और
शिष्य का रिश्ता। आज किसी भी छात्र में अपने गुरु के प्रति कोई सम्मान नहीं बचा।
ना तो वह उनका कहा मानता है और ना ही उनका आदर करता है। और यह भी हमने पाश्चात्य
के कल्चर से अपनाया है। एक ओर पश्चिमी देशों के लोग भारतीय संस्कृति को अपना रहे
हैं वहीं दूसरी ओर हम उनके कल्चर को अपना रहे हैं जो अनुचित है।
ऐसे ही सास और
बहू का रिश्ता। आज कोई भी बहू अपनी सास के प्रति आदर नहीं रखती और ना ही कोई सास
अपनी बहू को बेटी के समान समझती। ऐसा इसीलिए क्योंकि बचपन से ही टीवी सीरियल्स में
यही दिखा दिया जाता है कि सास और बहू के बीच हमेशा अनबन होती रहती है। तो फिर
उनमें से किसी को भी सम्मान देना आचरण में कैसे आएगा।
पति और पत्नी
के बीच का संबंध भी एक अनुबंध बनकर रह गया है जिसे आप न्यायालय के माध्यम से तोड़
सकते हैं। जहाँ सात जन्मों तक साथ निभाने की कसम खाई जाती थी, वहाँ उसे पहले ही जन्म में तोड़ लेते हैं। विचारों में इतना परिवर्तन कैसे आ
गया समझ नहीं आता।
भाई और बहन का
रिश्ता भी लोभ का रिश्ता बनकर रह गया है। बहन चाहती है कि उनका भाई उन्हें सब कुछ
दे और भाई चाहता है कि उनकी बहन उनको सब कुछ दे। और इस "सब कुछ" में
सिर्फ पैसों का ही लोभ रहता है। अगर भाई की स्थिति खराब है और वह बहन को विदाई में
कुछ नहीं दे पाता तो बहन रूठ जाएगी और यदि बहन की स्थिति खराब है और वह अपने भाई
को कुछ नहीं दे पाती तो उसका भाई रूठ जाएगा।
दामाद जी भी
अपने ससुराल से सब कुछ चाहते हैं। वह चाहते हैं कि वहाँ उन्हें सम्मान मिले, प्रतिष्ठा मिले। परंतु जब ऐसा नहीं हो पाता है तो वह रूठ जाते हैं। ये विचार
भी इसीलिए उत्पन्न हुए क्योंकि यह सीरियल्स में दिखाये जाते रहे हैं। हमेशा दामाद जी
और जीजा जी को शादी ब्याह में रूठा हुआ ही दर्शाया जाता है, तो वही विचार मन में भी आ जाते हैं। लेकिन भारतीय संस्कृति में ऐसा नहीं होता
था। यहाँ तो प्रत्येक व्यक्ति संतुष्ट रहता था और ना ही उसे किसी प्रकार का लोभ
था।
सिर्फ ये ही
नहीं ऐसे अनेकों रिश्ते हैं जो आज की परिस्थिति में पश्चिमी कल्चर के प्रभाव के
कारण बदल चुके हैं। आज हमने पश्चिमी कल्चर से प्रभावित होकर अपने मूल्यवान रिश्तों
को मजाक बनाकर रख दिया है और हो सकता है आने वाले समय में जो बचे हुए रिश्ते हैं, जिनका आज हम सम्मान करते हैं उन्हें भी मजाक बना दिया जाए!
परंतु मेरी समझ
में यह नहीं आता कि आज हम अपनी संस्कृति को छोड़ कर विदेशी कल्चर को क्यों अपना
रहे हैं? क्यों हमें अपनी संस्कृति से इतना प्रेम नहीं है कि हम उसे अपना आचरण बना सकें? क्यों हम विदेशी कल्चर को अपना आचरण बना रहे हैं? ऐसा कल्चर जिसका कोई मूल्य नहीं है, जिसमें किसी को सम्मान नहीं दिया
जाता है, जहाँ प्रत्येक व्यक्ति को एक भोग की वस्तु समझा जाता है उस कल्चर को आज हम
क्यों अपनाते जा रहे हैं इस पर हमें विचार करने की आवश्यकता है। क्योंकि अगर ऐसा
ही चलता रहा तो भारतीय संस्कृति में माने जाने वाले सभी रिश्ते-नाते समाप्त हो
जाएंगे इसमें कोई संदेह नहीं!
- कृष्णांश
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