वसुधैव कुटुम्बकम् की विलुप्त होती अवधारणा

जहाँ कहीं भी परिवार के विषय में चर्चा की जाती है वहाँ सनातन संस्कृति से जन्मे दो शब्द अवश्य याद किए जाते हैं:- वह हैं वसुधैव कुटुम्बकम्। 

कहने को तो यह दो शब्द भर हैं, परंतु इनका सार अनेक पन्नों में समा जाए, इतना सामर्थ्य रखता है। और रखें भी क्यों नहीं आखिर सनातन संस्कृति से जन्मे हैं, जहाँ हर विषय पर कुछ ही शब्दों में गहराई से बात कह दी जाती है। वसुधैव कुटुम्बकम् में भी कुछ ऐसा ही गहरा अर्थ विद्यमान है जिसे समझने में शायद आज की पीढ़ी सामर्थ्य हीन है। परंतु फिर भी इसे समझने का प्रयास करते हैं।

वसुधैव कुटुम्बकम्, जिसका अर्थ है कि, "वसुधा का प्रत्येक कण एक परिवार के समान है"। वसुधा कौन- यह धरती जहाँ मनुष्य निवास करता है, और कुटुम्बकम् अर्थात परिवार जिसका संबंध इस धरा पर रहने वाले मनुष्य के साथ है। और इस धरा का प्रत्येक कण परिवार के सदस्य के समान है।

परंतु क्या मनुष्य अपने परिवार के सदस्यों के साथ अच्छा संबंध स्थापित करने में उत्तीर्ण हुआ है? परिवार के अन्य सदस्य तो मनुष्य के साथ अच्छा व्यवहार करते हैं, परंतु क्या मनुष्य भी उसी प्रकार का व्यवहार उनके साथ करता है?

नहीं!

आज मनुष्य के लिए वसुधैव कुटुम्बकम् की अवधारणा विलुप्त होती जा रही है। वह अपने परिवार के सदस्यों के साथ उस प्रकार का व्यवहार नहीं करता जिस प्रकार का व्यवहार वह उनसे चाहता है।

मनुष्य अपने परिवार की महिला सदस्य धरती से तो चाहता है कि वह अच्छी फसल उपजाए, उसे स्थान भी दे जिससे उसके रहने के लिए मकान बन सके और चलने के लिए सड़क बन सके, और बदले में धरती मनुष्य से चाहती है कि उसका संरक्षण हो। लेकिन क्या मनुष्य धरती का संरक्षण करने में सक्षम हुआ है? नहीं! जिस मिट्टी में वह कभी बचपन में खेला करता था, जिस धरती की गोद में रहकर उसे ममता मिली, आज उसी ममतामयी मिट्टी को उसने सड़क की कई परतों के नीचे दबा दिया है।

एक और सदस्य है जल जिससे मनुष्य चाहता है कि वह उसकी प्यास भुजाए, उसके गंदे कपड़े तथा उसके मकान को साफ करने में सहायता करे, विभिन्न व्यापारिक उत्पादों के उत्पादन में सहायता करे और बदले में जल भी वही चाहता है जो धरती चाहती है, कि उसका संरक्षण हो। परंतु ऐसा करने में मनुष्य सक्षम है क्या? नहीं! चलो यह जल तो उम्र में बड़ा है परंतु एक छोटा सदस्य भी है जिसे हम भू-जल के नाम से जानते हैं जो धरती की गोद में रहता है, परंतु मनुष्य की लाभकारी गतिविधियों ने सुखा उसे भी दिया है। बच्चे को ही नहीं छोड़ा तो बड़े को क्या छोड़ेंगे!

एक और सदस्य है वायु जिससे मनुष्य चाहता है कि वह शुद्ध रहे ताकि मनुष्य अच्छे से साँस ले सके, जब गर्मी लगे तो वह उसे ठंडी हवा दे और वायु भी मनुष्य से चाहती है कि उसका संरक्षण हो। फिर वही प्रश्न उठता है क्या मनुष्य ऐसा करने में सक्षम है? नहीं!

और ये तीनों सदस्य उन पंचतत्वों में शामिल हैं जिनसे यह संसार चलता है, अर्थात यह तीनों सदस्य इस विशाल कुटुंब की प्रबंधन समिति में शामिल हैं, जिसका प्रभाव मनुष्य के जीवन पर पड़ता है। परंतु फिर भी मनुष्य ने इनके साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया। अब परिवार सिर्फ दो तत्वों पर आधारित रह गया है, अग्नि और आकाश। और वह भी इसीलिए है क्योंकि मनुष्य ने इनको अभी तक कोई खास हानि नहीं पहुंचाई है। लेकिन कब तक ऐसा रहेगा, कुछ कह नहीं सकते! मनुष्य किस हद तक गिर सकता है इसका अनुमान शायद नहीं लगाया जा सकता।

कहने का तात्पर्य है कि जब मनुष्य ने उन पंच तत्वों को ही नहीं छोड़ा जिन पर समस्त संसार आधारित है तो बाकियों को क्या ही छोड़ेगा!

अगर संपूर्ण विश्व एक परिवार है तो यहाँ रहने वाले प्रत्येक जीव जंतु भी उसी परिवार का सदस्य ही हुआ, परंतु आज मनुष्य की क्षुधा इतनी बढ़ चुकी है कि अगर उससे कह दिया जाए कि फलना जीव खाने से पोषण मिलता है, या फलाना जीव खाने में अत्यंत स्वादिष्ट है तो मनुष्य उसे खाने को सहज ही तैयार हो जाएगा, कोई क्योंकि प्रश्न भूख का है! इतना ही नहीं जब शरीर को ढंकने की बात आती है तो उन्हीं जीव-जन्तुओं का चमड़ा वस्त्र बनाने के प्रयोग में ले लिया जाता है। ऐसा व्यवहार कोई कर सकता है अपने परिजनों के साथ!

विभिन्न प्रकार के पक्षी भी परिवार का हिस्सा है, लेकिन विकास के नाम पर इतने मोबाइल टावर लगा दिए गए है कि आज उन पक्षियों का जीवित रहना असंभव सा हो गया है, और बहुत से पक्षियों की प्रजाति ही विलुप्त हो गई है। परंतु मनुष्य पर इसका कोई असर नहीं पड़ता। आज मनुष्य अपनी मनुष्यता खो बैठा है।

आखिर क्या दोष था कर उस मच्छर का जिसे जहर देकर मार दिया जाता है, क्या दोष था उस चूहे का जिसको चिकित्सा क्षेत्र में शोध करने के लिए मार दिया जाता है ताकि मनुष्य जीवित रह सके। एक का जीवन बचाने के लिए अन्य जीव को का बलिदान क्यों? क्या दोष था उस हाथी का जिसके दांतों से श्रंगार के उत्पाद बनते हैं। और ऐसे अनेकों जीव हैं जिन्हें मनुष्य अपने फायदे के लिए प्रयोग करता है, चाहे वह मरे या जीवित रहे, इस से कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

आज प्रश्न मनुष्य पर नहीं मनुष्यता पर उठता है, जिस संस्कृति में वह रहता है उस संस्कृति पर उठता है। परंतु इस प्रश्न का उत्तर देने वाला कोई नहीं! और होगा भी क्यों, इस प्रश्न को खड़ा करने वाले सभी मनुष्य ही तो हैं!

अगर आज हमनें वसुधैव कुटुम्बकम् की अवधारणा को नहीं समझा तो वो दिन दूर नहीं जब मनुष्य ही मनुष्य को खाएगा क्योंकि समय के साथ-साथ उसकी भूख और बढ़ेगी।

हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि यह समस्त वसुधा हमारा परिवार ही है और यहाँ रहने वाले प्रत्येक जीव-जन्तु और साथ मे प्रत्येक कण जिसमें पेड़-पौधे, वायु, आकाश, धरती, जल, मिट्टी आदि उस परिवार के सदस्य हैं।

अगर ऐसा नहीं हुआ तो परिणाम हम सबको पता ही है!

                                                                                                                                                       - कृष्णांश


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