मानवता का व्यापक रूप ही हिन्दुत्व है!

हिंदुत्व आज एक ऐसा विषय बन के रह गया है जिस विषय पर कोई बोलना नहीं चाहता। अगर आप अपने मित्रों के साथ, अपने परिजनों के साथ, हिंदुत्व के विषय पर चर्चा करते हैं, तो आपको गंदी राजनीति करने वाला व्यक्ति मान लिया जाएगा। हो सकता है आपको संविधान का विरोधी भी कह दिया जाए परंतु अपने धर्म का प्रचार करना तो संविधान में भी उचित है। तो ऐसे में कोई व्यक्ति संविधान विरोधी कैसे हो सकता है यदि वह मात्र अपने धर्म का प्रचार कर रहा है?

हमें समझने की आवश्यकता है कि हिंदुत्व सिर्फ राजनीति का विषय ना होकर भारत की चेतना का विषय है। अगर हिंदुत्व ना हो तो भारत निर्जीव सा प्रतीत होगा। हिन्दुत्व भारत की विशेषता है, जो बाकी देशों से भारत को भिन्न करती है। सर्व-धर्म समभाव की विचारधारा हिंदुत्व है, और अगर इस विषय पर चर्चा ना की जाए तो भारत भी अन्य देशों की भांति कट्टरवाद की मार्ग पर चल पड़ेगा।

आपने लोगों के मुख से अक्सर सुना होगा कि, "हम किसी धर्म को नहीं मानते, हमारे लिए तो मानवता सर्वोपरि है!" सुनने में तो यह वाक्य अच्छा लगता है, लेकिन क्या सच में हिंदुत्व के बिना मानवता जीवित रहेगी? 

यह सोचने लायक विचार है! हमें इस पर सोचना चाहिए!

यह विचार उन्हीं लोगों के मन में आते हैं या ऐसे वाक्य उन्हीं लोगों के मुख से सुनने को मिलते हैं जिन्होंने सनातन धर्म को जाना ही नहीं, जिन्होंने हिंदुत्व की विचारधारा को पहचाना ही नहीं। ये वही लोग हैं जो अपने मन से कुछ भी विचार बना लेते हैं। इनका शास्त्रों से कोई लेना-देना नहीं है बस बातें अच्छी बना लेते हैं। वे लोग जिन्होंने कभी धार्मिक ग्रंथों को खोलकर देखा नहीं, वे लोग जिन्होंने कभी ऋषि-मुनियों को सुना नहीं, वे लोग जिन्होंने कभी धर्म का समझा नहीं उन लोगों के लिए मानवता सर्वोपरि है पर हिंदुत्व नहीं। कितना विरोधाभास है इन विचारों में!

धर्म से तात्पर्य है धारण करने योग्य। ऐसे विचार जिन्हें आप अपना सकें, जिन्हें आप धारण कर सकें वह धर्म है और यही हिंदुत्व हमें सिखाता है। मानवता मात्र एक विचार है और हिंदुत्व उस विचार का व्यापक रूप! इसीलिए हमें हिंदुत्व को समझना होगा मानवता तो अपने आप आ जाएगी। यहाँ पर लोगों से एक और भूल होती है। वे दानवता का अंत करने के लिए उठाए गए कदमों को भी मानवता के विरुद्ध समझ लेते हैं। क्योंकि दानवता का अंत करने में हिंसा होती है, लेकिन हिंदुत्व तो हिंसा का विरोध करता है! उन्हें यह समझना होगा की दानवता का अंत करना हिंसा नहीं अपितु अहिंसा ही है। जो विचार जन कल्याणकारी ना हो, जिससे समाज का अहित होता हो उस विचार का अंत करना मानवता ही है। 

अगर कोई हिंदुत्व की बात करता है तो उसे कट्टरवाद से नहीं मानवता से ही जोड़िए, क्योंकि मात्र हिंदुत्व ही एक ऐसी विचारधारा है जो मानवता की बात करती है, अन्यथा किसी भी धर्म की विचारधारा मानवता की बात नहीं करती। क्योंकि जिस धर्म में धर्म परिवर्तन जैसी विचारधाराएं हैं वह मानवता की बात कर ही नहीं सकते। क्योंकि धर्म परिवर्तन कराने के लिए अनेकों हथकंडे अपनाए जाते हैं, जो मानवता के विरुद्ध हैं। मात्र हिंदुत्व ही एक ऐसी विचारधारा है जिसमें धर्म परिवर्तन का कोई विषय ही नहीं है। मात्र सनातन धर्म ही एक ऐसा धर्म है जो कभी यह नहीं कहता कि आप अपना धर्म छोड़कर हमारे धर्म को अपनायें।

इसीलिए उचित यही होगा कि हम मानवता और हिंदुत्व के बीच का संबंध समझें और उसमें तर्क ना करें!!

- कृष्णांश


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